मोहम्मद आलम प्रधान सपादक
alamkikhabar.com
---------------------------------------
जहां शब्द नहीं, संस्थान बोलते हैं
सम्मान की प्रतीक्षा में एक असाधारण जीवन : डॉ. रामस्वरूप महतो
---------------------------------------
बिहार की धरती केवल आंदोलनों और संघर्षों की साक्षी नहीं रही है, बल्कि इस मिट्टी ने ऐसे-ऐसे कर्मयोगी भी पैदा किए हैं जिन्होंने खामोशी से समाज की दिशा बदल दी। दुर्भाग्य यह है कि वंचित समाज से आने वाले इन महान व्यक्तित्वों का मूल्यांकन अक्सर उनके त्याग और योगदान के अनुपात में नहीं हो पाता। डॉ. रामस्वरूप महतो ऐसे ही एक विलक्षण व्यक्तित्व थे, जिनका पूरा जीवन सेवा, शिक्षा और सामाजिक न्याय को समर्पित रहा।
डॉ. रामस्वरूप महतो की सबसे बड़ी पहचान यह नहीं थी कि वे एक सफल चिकित्सक थे, बल्कि यह थी कि उन्होंने अपने व्यक्तिगत संघर्षों को सामाजिक परिवर्तन की शक्ति में बदल दिया। यह सर्वविदित है कि आत्मविश्वास किसी भी व्यक्ति की उन्नति की कुंजी होता है, लेकिन यह आत्मविश्वास समान अवसरों और न्यायपूर्ण सामाजिक ढांचे से ही जन्म लेता है। डॉ. महतो ने जिन अभावों, विषमताओं और सीमाओं में जीवन शुरू किया, उन्होंने यह ठान लिया कि उनकी अगली पीढ़ी उन्हीं हालातों की बंदी नहीं बनेगी। यही संकल्प उनके जीवन की सबसे बड़ी क्रांति बन गया।
दरभंगा मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने इंग्लैंड जाकर नेत्र-रोग विशेषज्ञ के रूप में अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा अर्जित की। विदेशी धरती पर सम्मान, धन और सुविधा—सब कुछ उनके पास था, लेकिन उनका मन अपनी मिट्टी, अपने समाज और अपने लोगों से कभी अलग नहीं हुआ। जब अधिकांश लोग विदेश में ही स्थायी जीवन चुनते हैं, तब डॉ. महतो ने जीवन के उत्तरार्ध में गांव लौटने का निर्णय लिया—यह निर्णय अपने आप में असाधारण था।
गांव लौटकर उन्होंने केवल उपदेश नहीं दिए, बल्कि ठोस संस्थागत काम किए। उन्होंने अपने पिता की स्मृति में रामकृष्ण ट्रस्ट की स्थापना की और वर्ष 1998 में समस्तीपुर जिले के रोसड़ा अंचल अंतर्गत बटहा गांव में अपनी माता के नाम पर सुंदरी देवी सरस्वती विद्या मंदिर की नींव रखी। यह विद्यालय केवल एक शैक्षणिक संस्थान नहीं था, बल्कि वंचित, पिछड़े और साधनहीन वर्ग के बच्चों के लिए एक नए भविष्य का प्रवेश द्वार था।
डॉ. रामस्वरूप महतो का त्याग आज के समय में विरल उदाहरण है। उन्होंने अपनी पुश्तैनी 12 एकड़ भूमि विद्यालय को दान कर दी। यही नहीं, विदेश में वर्षों की कमाई को उन्होंने निजी वैभव में नहीं, बल्कि शिक्षा के विस्तार में लगाया। बाद में जब आवश्यकता पड़ी तो भाइयों और ग्रामीणों से उचित मूल्य देकर अतिरिक्त भूमि खरीदी और उसे भी विद्यालय के नाम समर्पित कर दिया। आज लगभग 26 एकड़ में फैला यह विशाल परिसर उनकी दूरदृष्टि, प्रतिबद्धता और सामाजिक सरोकार का जीवंत प्रमाण है।
उनके सपनों की सबसे बड़ी संस्थागत मान्यता वर्ष 2022 में मिली, जब सुंदरी देवी सरस्वती विद्या मंदिर को सैनिक स्कूल का दर्जा प्राप्त हुआ। यह उपलब्धि केवल एक विद्यालय की नहीं थी, बल्कि बिहार के लिए भी गौरव का विषय थी, क्योंकि लंबे अंतराल के बाद राज्य को ऐसा सम्मान मिला। यह उस विचार की जीत थी कि यदि नीयत साफ हो और उद्देश्य समाजहित का हो, तो बदलाव अवश्य संभव है।
इतना सब कुछ करने के बावजूद यह एक कड़वा सत्य है कि डॉ. रामस्वरूप महतो को उनके जीवनकाल में वह सम्मान नहीं मिल पाया, जिसके वे वास्तविक हकदार थे। उन्होंने शिक्षा को कभी निजी प्रतिष्ठा या नाम कमाने का साधन नहीं बनाया, बल्कि इसे सामाजिक न्याय और समान अवसर का औजार माना। ऐसे कर्मयोगी को यदि पद्म पुरस्कार जैसे राष्ट्रीय सम्मान से अलंकृत किया जाता है, तो यह केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं होगा, बल्कि उस विचारधारा का सम्मान होगा जो मानती है कि शिक्षा से समाज की दिशा बदली जा सकती है।
आज समय की मांग है कि बिहार सरकार और केंद्र सरकार मिलकर डॉ. रामस्वरूप महतो के योगदान का सम्यक और निष्पक्ष मूल्यांकन करें तथा उन्हें मरणोपरांत राष्ट्रीय सम्मान प्रदान करें। यह सम्मान न केवल इतिहास के साथ हुए अन्याय की भरपाई करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह स्पष्ट संदेश देगा कि त्याग, सेवा और शिक्षा के लिए समर्पित जीवन कभी व्यर्थ नहीं जाता।
डॉ. रामस्वरूप महतो जैसे व्यक्तित्व वास्तव में वे दीपस्तंभ होते हैं, जो अंधकार में भी रास्ता दिखाते हैं। उन्होंने शब्दों से नहीं, संस्थानों से बोला।उनका सम्मान—केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि हमारे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।